25 अगस्त 2019 - 13:30
सीरिया के पटल पर बश्शार असद के बढ़ते क़दम, महंगी पड़ गई अर्दोग़ान को आतंकियों की दोस्ती, अरब जगत के प्रख्यात लेखक अब्दुल बारी अत

लंदन से अरबी भाषा के समाचार पत्र रायुल यौम के संपादक अब्दुल बारी अतवान ने शनिवार के अपने संपादकीय में उत्तरी सीरिया में सेना की उपलब्धियों और तकफ़ीरी आतंकवादी गुट नुस्रा फ्रंट की विफलताओं के बारे में जाएज़ा लिया है।

रायुल यौम के संपादक अब्दुलबारी अतवान अपने लेख में लिखते हैं कि, रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यब अर्दोग़ान के बीच शुक्रवार को हुई टेलीफ़ोनी वार्ता अप्रत्याशित नहीं थी। मेरे कहने का उद्देश्य अप्रत्याशित से यह नहीं है कि मैंने कुछ दिन पहले भविष्यवाणी की थी कि सीरिया की सेना ख़ान शेख़ून से आतंकिवादियों को जल्द मार भगाएगी और उसे अपने नियंत्रण में ले लेगी, बल्कि तात्पर्य यह है कि रूस के समर्थन से सीरिया की सेना की प्रगति तुर्की के लिए परेशानी की वजह बनती जा रही है और अर्दोग़ान इस परेशानी से निपटने के रास्ते तलाश रहे हैं।

पुतीन और अर्दोग़ान के बीच हुई टेलीफ़ोनी वार्ता, दो अप्रत्याशित और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अधारित हैः 

पहला बिंदू, मॉस्को या सूची में आगामी 16 सितंबर को आयोजित होने वाली आस्ताना वार्ता प्रक्रिया की गारैंटी देने वाले तीनों देशों, रूस, ईरान और तुर्की के पांचवें शिखर सम्मेलन पर सहमति है।  इस बैठक में जहां सीरिया संकट के समाधान के बारे में चर्चा होनी है वहीं संविधान समिति का गठन भी होना है, जो सीरिया की सरकारी और विपक्षी हस्तियों की साझेदारी से नए संविधान का मसौदा तैयार करेंगे।

दूसरा बिंदू, रूस और तुर्की के राष्ट्राध्यक्षों की आतंकवाद के ख़तरे विशेषकर इदलिब में मौजूद आतंकी गुटों से निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों पर सहमति है।

इन दोनों बिंदुओं में दूसरा बिंदु बहुत अहम है क्योंकि उसमें आतंकी गुटों के ख़तरे से छुटकारा पाने पर बल दिया गया है। इस बिंदू में जिन आतंकी गुटों से छुटकारे की बात की गई है वह हैं हैअत तहरीरूश्शाम, जिसको पहले जिब्हतुन्नुस्रा के नाम से जाना जाता था और वे सभी आतंकी गुट जो इस आतंकी गुट के सहयोगी हैं, जैसे अहरारुश्शाम जो अमेरिका, रूस और सीरिया की आतंकी गुटों की सूचि में है लेकिन तुर्की के नेताओं के बहुत नज़दीक हैं।

जिस बात की पहले से भविष्यवाणी की जा सकती है वह यह है कि, आगामी आस्ताना वार्ता प्रक्रिया की गारैंटी देने वाले देशों के शिखर सम्मेलन का एजेंडा रूसी और तुर्क राष्ट्रपतियों के बीच हुई टेलीफोनी वार्ता को व्यावहारिक रूप प्रदान करना और इसके राजनीतिक या सैन्य कार्यान्वयन के लिए आवश्यक तंत्र विकसित करना होगा।

संभवतः वार्ता की मेज़ पर कई विकल्प हो सकते हैं और यह भी हो सकता है कि इन विकल्पों में मौजूद मिठास अर्दोग़ान और आतंकवादी गुटों विशेषकर तहरिरुश्शाम (नुस्रा फ्रंट) के लिए कड़वी हो।

पहला विकल्प यह है कि, नुस्रा फ्रंट ख़ुद को भंग कर दे और अपने हथियारो को विशेषकर अपने भारी हथियारों को एक संयुक्त त्रिपक्षीय समिति को सौंप दे और एक राजनीतिक फ्रंट में परिवर्तित हो जाए और रूस, ईरान और तुर्की की गारंटी के साथ सूची समझौते में शामिल हो जाए।

दूसरा विकल्प यह है कि, तुर्की अपने आप को पूरी तरह से इन आतंकी गुटों से अलग कर ले और रूस एवं सीरिया की सेना द्वारा नुस्रा फ्रंट के नियंत्रण वाले इदलिब शहर की आज़ादी के लिए आरंभ किए जाने वाल सैन्य ऑपरेशन में शामिल हो जाए। तीसरा विकल्प यह है कि, तुर्की के राष्ट्रपति को कुछ सप्ताह की मोहलत दी जाए, ऐसी ही एक महीने की मोहलत वर्ष 2018 में आयोजित हुए सूची शिखल सम्मेलन में तुर्की को दी गई थी लेकिन अंकारा अपनी प्रतिबद्धताओं पर खरा नहीं उतरा था।

इस बात का आकलन करना कि तुर्की कौन से विकल्प को चुनेगा, हमारे लिए कठिन है, क्योंकि तुर्की और रूस के बीच हुई सहमति बिल्कुल नई है और उसे अभी कुछ ही घंटे गुज़रे हैं, लेकिन सीरिया के कुछ ऐसे सूत्र जो तुर्की के राष्ट्रपति के क़रीबी माने जाते हैं, उनके अनुसार नुस्रा फ्रंट ख़ुद को भंग करने और राजनीतिक दल में परिवर्तित होने के लिए तैयार है। मैं समझता हूं कि पहला विकल्प अपनाए जाने की संभावना अधिक है क्योंकि उसमें कम क़ीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन अंतिम निर्णय स्वयं आतंकी गुट नुस्रा फ्रंट के हाथ में है जो अपने समर्थकों से परामर्श के बाद लेगा।

दूसरा विकल्प, अर्थात सीरिया और रूस के साथ मिलकर इदलिब शहर की आज़ादी की कार्यवाही में भाग लेना है, वैसे ही कि जैसा दूसरे क्षेत्रों में हुआ है, यह मंहगा पड़ सकता है। इस स्थिति में हो सकता है कि सीरियाई सरकार ने आम नागरिकों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर खोलने की जो बात की है वह इदलिब के लोगों की समस्याओं के समाधान का बेहतरीन रास्ता साबित हो।

मैं नहीं समझता कि तुर्की के अधिकारी इस विकल्प को स्वीकार करेंगे, क्योंकि सैन्य विकल्प को मानने का अर्थ होगा उनकी सबसे बड़ी पराजय। तुर्की द्वारा सैन्य विकल्प को स्वीकार करना इस बात कारण बनेगा कि उसके सहयोगी उसपर मिलीभगत का आरोप लगाएंगे और अगर तुर्की विरोध करता है तो इसका अर्थ होगा रूस के साथ सीधा सैन्य टकराव और अंकारा के लिए इसका क्या परिणाम होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। अगर इस तरह का सैन्य टकराव हुआ तो लाखों आम नागरिक और सशस्त्र बल हथियारों के साथ तुर्की में घुस जाएंगे और यह ऐसी स्थिति में होगा कि जब पहले से ही तुर्की में 35 लाख शरणार्थी मौजूद हैं और उनकी वजह से के लिए राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा समस्याएं उत्पन्न होने लगी हैं। 

अंत में यह तुर्की सभी विकल्पों को नज़रअंदाज़ कर दे और अपने सहयोगी तहरीरुश्शाम के सरग़ना अबू मोहम्मद अलजौलानी को चुन ले।

इदलिब का खेल अब ख़त्म होने वाला है और अबू मोहम्मद अलजौलानी के ज़्यादातर समर्थक उसे छोड़कर चले गए हैं और अब अकेले ही उसे अपने अंजाम का सामना करना है। दूसरी ओर पुतीन का धैर्य जवाब दे चुका है। दो महीने पहले सीरिया के हमीमीम में स्थित रूस के सैन्य ठिकाने पर ड्रोन से हुआ हमला पुतीन के क्रोध का मुख्य कारण है और ऐसी स्थिति में यह नहीं सोचा जा सकता कि रूस के राष्ट्रपति इदलिब की आज़ादी के लिए की जाने वाली कार्यवाही को कुछ समय के लिए टाल देने की तुर्की की अपील को स्वीकार कर लेंगे या सूची शिखर सम्मेलन में तुर्की के एक साल के विलंब के आग्रह को मान लेंगे, ख़ासतौर पर ऐसी स्थिति में कि जब सीरियाई सेना तेज़ी से प्रगति कर रही है। (RZ)   साभार,रायुल यौम